कलावती कुछ घरों में पौंछा-बर्तन करके, अपने परिवार का पेट पालती है। क्या करे?
ख़सम तो कुछ कमाता-धमाता है नहीं, ऊपर से पीकर, मारपीट करता है। वो अलग से.....।
आज तो हद ही हो गई!
छगनु ने जब कलावती से पैसे माँगे तो, कलावती ने मना कर दिया।
"तेरी दारू के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।"
यह सुनते ही छगनु कलावती की ठुकाई करने लगा।
"तू कितना भी मार ले? मैं पैसे नहीं दूँगी। कल बन्नो की स्कूल की फीस भरनी है"। कलावती दृढ़ निश्चय से बोली।
"ऐसे नहीं मानेगी मालजादी!"?
एक और धौल मारते हुए छगनु बड़बड़ाने लगा।
"क्या? बोला रे तू।" एक कड़कती हुई आवाज जब कान के पर्दे फाड़ती हुई अंदर घुसी तो.....
"कुछ नहीं माई"।
"कुछ तो है?"
"यह पैसे नहीं दे रही तो।".....
"तो क्या?"
"तू इसे मालजादी बोलेगा? औलाद पैदा तो कर ली, इसको पढ़ाएगा कौन? तेरे बच्चों को यह ही पाल रही है। साथ ही तुझे और तेरी माँ को भी।
खबरदार! जो आज के बाद बहू को ऐसे शब्द बोला तो।"
"तेरा दोष नहीं है। नाली का कीड़ा, नाली की ही सोचेगा"।
शकुन्तला अग्रवाल "शकुन"
भीलवाड़ा राज.
ख़सम तो कुछ कमाता-धमाता है नहीं, ऊपर से पीकर, मारपीट करता है। वो अलग से.....।
आज तो हद ही हो गई!
छगनु ने जब कलावती से पैसे माँगे तो, कलावती ने मना कर दिया।
"तेरी दारू के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।"
यह सुनते ही छगनु कलावती की ठुकाई करने लगा।
"तू कितना भी मार ले? मैं पैसे नहीं दूँगी। कल बन्नो की स्कूल की फीस भरनी है"। कलावती दृढ़ निश्चय से बोली।
"ऐसे नहीं मानेगी मालजादी!"?
एक और धौल मारते हुए छगनु बड़बड़ाने लगा।
"क्या? बोला रे तू।" एक कड़कती हुई आवाज जब कान के पर्दे फाड़ती हुई अंदर घुसी तो.....
"कुछ नहीं माई"।
"कुछ तो है?"
"यह पैसे नहीं दे रही तो।".....
"तो क्या?"
"तू इसे मालजादी बोलेगा? औलाद पैदा तो कर ली, इसको पढ़ाएगा कौन? तेरे बच्चों को यह ही पाल रही है। साथ ही तुझे और तेरी माँ को भी।
खबरदार! जो आज के बाद बहू को ऐसे शब्द बोला तो।"
"तेरा दोष नहीं है। नाली का कीड़ा, नाली की ही सोचेगा"।
शकुन्तला अग्रवाल "शकुन"
भीलवाड़ा राज.
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