दोहे
सत पथ पर चलते सदा, वो गढ़ते इतिहास।
दूर बुराई से रहे, जग में करे उजास।।
निजता का जिसने किया,है सदा सर्वदा त्याग।
पाकर भगवन की कृपा, खुलते उसके भाग।।
जो जितना कड़वा लगे, उतना सच्चा जान।
शहद पगा जो बोलता, विपदा का सामान।।
गले लगाया नेह को, कर ईर्ष्या को राख।
पनपी जीवन में तभी, मानवता की शाख।।
मन में घुसने को खड़ी, कब से आतुर प्रीति।
खोलो जरा कपाट तो, छोड़ दोहरी नीति।।
दुख के पूर्ण विराम में, सुख का अल्प विराम।
पलभर को बादल छँटे, कैसे हो आराम।।
निजहित में हो बावरे, खूब बहाया रक्त।
क्यों रोता बेकार में, निकल गया जब वक्त।।
उर्वर हो बंजर धरा, सींचो उसमें प्रीति।
पुष्प खिलेंगे नेह के, यही जगत की रीति।।
मनवा पंछी बावरा, कसकर रखो नकेल।
वर्ना माया मोह में, देगा तुम्हें धकेल।।
छप्पन भोग करे यहाँ, पत्थर के भगवान।
बच्चे बिलखे भूख से, जीवन मौत समान।।
रिश्ते नातो की जगह,भाने लगे करोड़।
नर हिंसक होता तभी, मानवता को छोड़।।
शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.
सत पथ पर चलते सदा, वो गढ़ते इतिहास।
दूर बुराई से रहे, जग में करे उजास।।
निजता का जिसने किया,है सदा सर्वदा त्याग।
पाकर भगवन की कृपा, खुलते उसके भाग।।
जो जितना कड़वा लगे, उतना सच्चा जान।
शहद पगा जो बोलता, विपदा का सामान।।
गले लगाया नेह को, कर ईर्ष्या को राख।
पनपी जीवन में तभी, मानवता की शाख।।
मन में घुसने को खड़ी, कब से आतुर प्रीति।
खोलो जरा कपाट तो, छोड़ दोहरी नीति।।
दुख के पूर्ण विराम में, सुख का अल्प विराम।
पलभर को बादल छँटे, कैसे हो आराम।।
निजहित में हो बावरे, खूब बहाया रक्त।
क्यों रोता बेकार में, निकल गया जब वक्त।।
उर्वर हो बंजर धरा, सींचो उसमें प्रीति।
पुष्प खिलेंगे नेह के, यही जगत की रीति।।
मनवा पंछी बावरा, कसकर रखो नकेल।
वर्ना माया मोह में, देगा तुम्हें धकेल।।
छप्पन भोग करे यहाँ, पत्थर के भगवान।
बच्चे बिलखे भूख से, जीवन मौत समान।।
रिश्ते नातो की जगह,भाने लगे करोड़।
नर हिंसक होता तभी, मानवता को छोड़।।
शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.
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