"सत्य की राह पर चलकर हमेशा दुःख ही पाये है तुमने,लेकिन तुम हो कि खुद को बदलना ही नहीं चाहती। एन्जॉय करो जिंदगी को।कितनी मर्तबा समझाया है।" राकेश बोले जा रहे है और मालिनी भी हमेशा की तरह अनसुना कर अपने काम में मशगूल है।यही बात राकेश को कचोटती है।
अतः सदैव की तरह भड़क गए महाशय, "तुमसे कह रहा हूँ सुन रही हो"?
"मालूम है मुझे और सुन भी रही हूँ।"
"तो कुछ घुसता है भेजे में"?
"देखो में खुश हूँ अपनी जिंदगी से फिर आपको क्या तकलीफ है"? मालिनी ने टका सा जवाब दिया तो.....
"तुम कभी नहीं सुधरोगी तुम्हारे साथ मेरी भी".....
"खैर छोडो यार!"
"क्या छोडो?"
"क्या हो गया ऐसा की आगबबूला हो रहे हो?"
"यह बताओ जिसको भी काम होता है, तुमसे काम निकलवा लेता है लेकिन अभी कुछ दिनों पहले तुम बीमार थी कोई आया तुम्हें पूछने? सब डरते है कहीं कुछ काम करना पड़ जाएगा।"
"अरे नहीं आया तो न सही, जिसको कोई पूछने वाला नहीं होता उसको ईश्वर जल्दी ठीक कर देते है समझे जनाब"?
"हाँ समझ गया, तुम्हें तो खपने की आदत है, खपती रहो।" राकेश झुंझलाकर बोले तो
मालिनी से रहा न गया तो कह उठी.....
"बिच्छु डंक मारना नहीं छोड़ता तो साधु भी अपनी साधुता त्याग दे क्या?"
शकुन्तला 'शकुन'
सर्वाधिकार सुरक्षित
अतः सदैव की तरह भड़क गए महाशय, "तुमसे कह रहा हूँ सुन रही हो"?
"मालूम है मुझे और सुन भी रही हूँ।"
"तो कुछ घुसता है भेजे में"?
"देखो में खुश हूँ अपनी जिंदगी से फिर आपको क्या तकलीफ है"? मालिनी ने टका सा जवाब दिया तो.....
"तुम कभी नहीं सुधरोगी तुम्हारे साथ मेरी भी".....
"खैर छोडो यार!"
"क्या छोडो?"
"क्या हो गया ऐसा की आगबबूला हो रहे हो?"
"यह बताओ जिसको भी काम होता है, तुमसे काम निकलवा लेता है लेकिन अभी कुछ दिनों पहले तुम बीमार थी कोई आया तुम्हें पूछने? सब डरते है कहीं कुछ काम करना पड़ जाएगा।"
"अरे नहीं आया तो न सही, जिसको कोई पूछने वाला नहीं होता उसको ईश्वर जल्दी ठीक कर देते है समझे जनाब"?
"हाँ समझ गया, तुम्हें तो खपने की आदत है, खपती रहो।" राकेश झुंझलाकर बोले तो
मालिनी से रहा न गया तो कह उठी.....
"बिच्छु डंक मारना नहीं छोड़ता तो साधु भी अपनी साधुता त्याग दे क्या?"
शकुन्तला 'शकुन'
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