Tuesday, 30 April 2019

जब परते मन की उघेडूँ !

जब परते मन की उघेडूं
कुछ घाव से रिसने लगते ।
कर माँ की  याद लाचारी
वक्त बेवक्त अश्रु ढलते।।
कुछ सोचती रहती माँ के
अनजाने हाथ थे जलते।
बचपन में सवाल मचलते ।
ममता की छाँव के नीचे
कितने ही स्वप्न थे पलते।
जब परतें मन की उघेडूँ
कुछ घाव से रिसने लगते ।

पिता तब तो धौंस जमाते
आज खुद को बेबस पाते
तब सोच भविष्य बच्चों का
सब कमाई दाव लगाते।
जब आज वे मलते आँखें
अरमान से गलते लगते।
जब परतें मन की  उघेडूँ
कुछ घाव से रिसने लगते।

होता  है सपूत  बड़ा जब
सामने पिता के  खड़ा तब
तब माँ-माँ कह नहीं थकता
कभी बोल न मुख से झरता
आज वृद्धाश्रम में पलते
आँखो को रातदिन मलते
जब परतें मन की उघेडूँ
कुछ घाव से रिसने लगते ।

तब रसोई रौनक होती
कमरे मे कैद अब रोती
जब परतें मन की उघेडूँ
कुछ घाव से रिसने लगते ।

शकुंतला शकुन 
भीलवाड़ा, राजस्थान 
सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, 27 April 2019

दोहे - 27042019 1

घुसता माथ अनंग जब, बहके विश्वामित्र।
छूट गया वैराग्य अब, लगती बात विचित्र।।

पापों का मर्दन हुआ, छाया तब मधुमास।
मनवा गिरधर संग में, लगा रचाने रास।।

दुर्लभ मनु जीवन मिला, मत खोना बेकार।
करना ऐसे काज तुम, याद रखे संसार।।

परम सत्य है मौत तो, मत घबराना यार।
लुटा सके जितना लुटा, जीवन भर तू प्यार।।

डर-डर कर जीना नहीं, चाहे आये मौत।
जो डरता, मरता वही, जीवन बनता सौत।।

रिश्ते नाते सब यहीं, रह  जाएंगे  मीत।
उसका जीवन तर गया,गाता शिव के गीत।।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

लघु कथा - नाली का कीड़ा

कलावती कुछ घरों में पौंछा-बर्तन करके, अपने परिवार का पेट पालती है।  क्या करे?
ख़सम तो कुछ कमाता-धमाता है नहीं, ऊपर से पीकर, मारपीट करता है। वो अलग से.....।
आज तो हद ही हो गई!
छगनु ने जब कलावती से पैसे माँगे तो, कलावती ने मना कर दिया।
"तेरी दारू के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।"
यह सुनते ही छगनु कलावती की ठुकाई करने लगा।
"तू कितना भी मार ले? मैं पैसे नहीं दूँगी। कल बन्नो की स्कूल की फीस भरनी है"। कलावती दृढ़ निश्चय से बोली।
"ऐसे नहीं मानेगी मालजादी!"?
एक और धौल मारते हुए छगनु बड़बड़ाने लगा।

"क्या? बोला रे तू।" एक कड़कती हुई आवाज जब कान के पर्दे फाड़ती हुई अंदर घुसी तो.....
"कुछ नहीं माई"।
"कुछ तो है?"
 "यह पैसे नहीं दे रही तो।".....
"तो क्या?"
"तू इसे मालजादी बोलेगा? औलाद पैदा तो कर ली, इसको पढ़ाएगा कौन? तेरे बच्चों को यह ही पाल रही है। साथ ही तुझे और तेरी माँ को भी।
खबरदार! जो आज के बाद बहू को ऐसे शब्द बोला तो।"
"तेरा दोष नहीं है। नाली का कीड़ा, नाली की ही सोचेगा"।

शकुन्तला अग्रवाल "शकुन"
भीलवाड़ा राज.

Friday, 26 April 2019

लघु कथा - डंक

"सत्य की राह पर चलकर हमेशा दुःख ही पाये है तुमने,लेकिन तुम हो कि खुद को बदलना ही नहीं चाहती। एन्जॉय करो जिंदगी को।कितनी मर्तबा समझाया है।" राकेश बोले जा रहे है और मालिनी भी हमेशा की तरह अनसुना कर अपने काम में मशगूल है।यही बात राकेश को कचोटती है।
अतः सदैव की तरह भड़क गए महाशय, "तुमसे कह रहा हूँ सुन रही हो"?
"मालूम है मुझे और सुन भी रही हूँ।"
"तो कुछ घुसता है भेजे में"?
"देखो में खुश हूँ अपनी जिंदगी से फिर आपको क्या तकलीफ है"? मालिनी ने टका सा जवाब दिया तो.....
"तुम कभी नहीं सुधरोगी तुम्हारे साथ मेरी भी".....
"खैर छोडो यार!"
"क्या छोडो?"
"क्या हो गया ऐसा की आगबबूला हो रहे हो?"
"यह बताओ जिसको भी काम होता है, तुमसे काम निकलवा लेता है लेकिन अभी कुछ दिनों पहले तुम बीमार थी कोई आया तुम्हें पूछने? सब डरते है कहीं कुछ काम करना पड़ जाएगा।"
"अरे नहीं आया तो न सही, जिसको कोई पूछने वाला नहीं होता उसको ईश्वर जल्दी ठीक कर देते है समझे जनाब"?
"हाँ समझ गया, तुम्हें तो खपने की आदत है, खपती रहो।" राकेश झुंझलाकर बोले तो
मालिनी से रहा न गया तो कह उठी.....
"बिच्छु डंक मारना नहीं छोड़ता तो साधु भी अपनी साधुता त्याग दे क्या?"

शकुन्तला 'शकुन'
सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, 25 April 2019

दोहे - 26 04 2019 1

सांप नेवला साथ में,
अचरज की है बात।
दोनों मिलकर  कर रहे,
जनता पर संघात।।

गयी छेड़ उनकी नजर,
जब साँसों के तार।
मनमोहक लगने लगा,
मुझको ये संसार।।

मेरी चूनर पर चढ़ा,
जबसे रंग पलास।
जीवन में मेरे बसा,
तबसे ही मधुमास।।

कानन-कानन ढूँढता,
कस्तूरी, मृग रोज।
जब उर में झाँके नहीं,
क्यों हो पूरण खोज?

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

दोहे - 26 04 2019

धड़कन से धड़कन कहे,मत होना नाराज।
कैसे तेरे बिन बजे, अब साँसों के साज?

साँसों की सरगम कहे,खूब लुटाओ प्रीत।
महक उठेगी जिंदगी,पाकर अब मनमीत।।

भौतिकता ने कर दिया,जज्बातों का खून।
कैसे जीवन में खिले,बतला प्रेम प्रसून।।

नहीं करे कोई  यहाँ,धड़कन का व्यापार।
सौदागर जो मौत का,कोसेगा संसार।।

सहमी- सहमी जिंदगी,सिसक रहे जज़्बात।
करे कौन परवाह अब,करे कौन अब बात?

जमावड़ा आतंक का,गली-गली में आज।
जबसे दुनिया में हुआ,दुर्योधन का राज।।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

Wednesday, 24 April 2019

जीवन का आधार

प्रेम ही सत्य है
प्रेम ही शाश्वत है
प्रेम ही जीवन का आधार है
प्रेम ही जगत का सार है।
प्रेम बिन भूमि बंजर
चहुँदिश पतझड़ के मंजर।
होकर अंधे स्वार्थ में
प्रेम से क्यों भागे
क्यों तोड़े प्रेम के धागे।
पीकर प्रेम का जाम
मीराँ ने पाये श्याम।
प्रेम से प्राणों में स्पंदन
पल में हरता क्रंदन।
साधु संत सब करते
ढ़ाई आखर प्रेम की बातें
पाकर भक्ति की सौगातें।
जिसने समझा इस भेद को
उसने जी लिया वेद को।
प्रभु भी प्रेम के भूखे
खा लेते रूखे-सूखे
प्रेम के वश में भगवान
चाहे मान या मत मान।
जो समझ गया प्रेम का अर्थ
नहीं गया उसका जीवन व्यर्थ।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

दोहे - 24042019

दोहे

सत पथ पर चलते सदा, वो गढ़ते इतिहास।
दूर  बुराई  से  रहे, जग  में करे  उजास।।

निजता का जिसने किया,है सदा सर्वदा त्याग।
पाकर भगवन की कृपा, खुलते उसके भाग।।

जो जितना कड़वा लगे, उतना सच्चा जान।
शहद पगा जो बोलता, विपदा का सामान।।

गले लगाया नेह को, कर ईर्ष्या को राख।
पनपी जीवन में तभी, मानवता की शाख।।

मन में घुसने को खड़ी, कब से आतुर प्रीति।
खोलो जरा कपाट तो, छोड़ दोहरी नीति।।

दुख के पूर्ण विराम में, सुख का अल्प विराम।
पलभर को बादल छँटे, कैसे हो आराम।।

निजहित में हो बावरे, खूब बहाया रक्त।
क्यों रोता बेकार में, निकल गया जब वक्त।।

उर्वर हो बंजर धरा, सींचो उसमें प्रीति।
पुष्प खिलेंगे नेह के, यही जगत की रीति।।

मनवा पंछी बावरा, कसकर रखो नकेल।
वर्ना  माया  मोह  में, देगा  तुम्हें  धकेल।।

छप्पन भोग करे यहाँ, पत्थर के भगवान।
बच्चे बिलखे भूख से, जीवन मौत समान।।

रिश्ते नातो की जगह,भाने लगे करोड़।
नर हिंसक होता तभी, मानवता को छोड़।।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.