Tuesday, 2 July 2019

तुम ही बताओ


प्रिये!तुम ही बतलाओ
कैसे तुम्हें मनाऊँ?

गहन-निशा जब भर लेती है
आलिंगन में जग को,
विरह तभी जलाता प्रिये!
मेरे तन-मन को।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे पास तुम्हें बुलाऊँ?

तृप्त करने को तपती वसुधा
होड़ मची मेघों में ।
बनकर हरजाई तुमने-
जुदाई - रेखा खींची क्यों?
प्रिये!तुम्ही बतलाओ
दिल का किसको हाल दिखाऊँ?

 कली-कली जब शलभ मँडराते
मुझपे ढहाते जुल्म-कहर
तब काँटों की सेज पर बीते
रोजाना मेरा हर पहर।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे तुम्हें रिझाऊँ?

सर्वस्व तुम पर मैंने लुटाया
फिर क्यों तूने गरल पिलाया?
प्रिये!तुम्हीं  बताओ
कैसे तुम्हें बुलाऊँ?
नहीं ,समझ आता है,मेरी-
कैसे तुम्हें मनाऊँ?

2/7/2019
आत्मसंतोष

रंजन आज बहुत खुश है,क्योंकि उसका दाखिला देश के नामी कॉलेज में हो गया है।
पढ़ने में तो वह होशियार है ही, ऊपर से बड़े कॉलेज का नाम, लाखों की नौकरी लग जाएगी। सपने, गगन नापने लगे,बस चिंता है तो बस पापा की। तबियत ठीक नहीं रहती उनकी।
इन सब ख्यालों में ही खोये हुए  रंजन को नींद ने अपने आगोश में ले लिया।सपने में वो देखता है,कि उसने कॉलेज में टॉप किया है, मल्टीनेशनल कम्पनी में लाखों की नौकरी लग गयी है। वह उन्मुक्त-पंछी की तरह आकाश में विचरण कर रहा है।अचानक उसका फोन घनघना उठा "हैलो! हैलो!भय्या!पापा को अटैक पड़ गया।"
पसीने से तर-ब-तर रंजन  उठ बैठता है,इधर-उधर ताकता है।
हाय!इतना भयंकर सपना यदि सच हो गया तो?
मन ही मन एक फैसला लेकर वह उठा और पापा से जाकर बोला, "पापा मुझे नोकरी नहीं करनी, आपका व्यापार संभालना है।"
हाँ बेटा! किंतु पढ़ाई पूरी करने के बाद,यह कहके पिता ने बेटे को गले लगा लिया।
और रंजन आत्मसंतोष से भर गया।

1/7/2019

Friday, 28 June 2019

रतजगा

करते रतजगा ये नैन
दिलको कब मिलता है चैन?
अब प्रिये!आ भी जाओ
करने को मुझसे दो बैन।

दी यादों की बाती मूर
तेल विरह का पूर
दीप जलाता आठों याम
मुझे जलाता ज्यों काफूर
गए मनमीत जब से दूर।

सह-सह विरह, क्षण-क्षण मैं मरती।
पतझड़ के पत्तों सी झरती।
मन की मन में ही दफनाऊँ
बदनामी से  हूँ मैं डरती।


सावनी सरिता सा मन उफनाता
कभी सागर से मिल न पाता।
प्रियतम-प्रणय की आशा में
हर पल साँसें गिन न पाता।
पर कुछ कहने मैं डरती।
रातों को मैं मीन तड़पती।

15/6/19

Tuesday, 18 June 2019

मनहरण घनाक्षरी

पावनमय प्रीत से
  मधुरिम संगीत से
    सुगंध भरे गीत से
       गेह महकाइये।

  बहती  रसधार  हो
   सबके प्रति प्यार हो
    सुखमय संसार हो
       खुशियाँ लुटाइये।

मर्यादा को धार कर
  खुदगर्जी  पार कर
   अहम् पुचकार कर
     कर्तव्य निभाइये।

मन  में  ईमान  रख
 बुजुर्गों का मान रख
   स्वयं का सम्मान रख
       जीवन सजाइये।

12/5/2019

Sunday, 16 June 2019

विजया घनाक्षरी

मर्यादाओं को झटक
 मन  गया है भटक
  रिश्ते भी गये चटक
    बंजर हुआ चमन।

जीवन  नहीं  सरल
 स्वार्थ की घुली गरल
  सुख तो हुए विरल।
    गम  करते   शमन।

संस्कार हुए दफन
  करते कैसे  सहन?
   न माने कोई कहन
    कुछ तो करो मनन।

पकड़े रहो धरम
  रखना थोड़ी शरम
    जाए सुधर करम
      करें पाप का दमन।

20/ 5 /2019


Wednesday, 1 May 2019

हमको छल जाते !

फासले भी बड़े अजीब होते है?
बढ़ते तो बढ़ते ही चले जाते है
जाते-जाते हमको छल जाते है।

कभी घटाने की कोशिश की इनको तो,
घटाने के फेर में हम ही फिसल जाते है।

फिर लौटकर नहीं आ पाते,
जाने-अनजाने इतनी दूर निकल जाते है।

हमराही नहीं ढलते? जब हमारे अनुरूप,
हम उनके अनुरूप ढल जाते है।

यूंही साथ-साथ चलते-चलते,
कितने स्वप्न आँखों में पल जाते है।

और कभी कहीं बदनसीबी से,
पाला पड़ गया बेवफाई से
कड़ाई में पूड़ी ज्यों तल जाते है।

फिर भी जाने क्यों? किसी और की,
बाहों में वो हमें खल जाते है।

अकेलेपन का दंश झेलते-झेलते
हम यूंही एक दिन जग से चल देते है।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.