शकुन का पन्ना ...
Thursday, 28 October 2021
Tuesday, 2 July 2019
तुम ही बताओ
प्रिये!तुम ही बतलाओ
कैसे तुम्हें मनाऊँ?
गहन-निशा जब भर लेती है
आलिंगन में जग को,
विरह तभी जलाता प्रिये!
मेरे तन-मन को।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे पास तुम्हें बुलाऊँ?
तृप्त करने को तपती वसुधा
होड़ मची मेघों में ।
बनकर हरजाई तुमने-
जुदाई - रेखा खींची क्यों?
प्रिये!तुम्ही बतलाओ
दिल का किसको हाल दिखाऊँ?
कली-कली जब शलभ मँडराते
मुझपे ढहाते जुल्म-कहर
तब काँटों की सेज पर बीते
रोजाना मेरा हर पहर।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे तुम्हें रिझाऊँ?
सर्वस्व तुम पर मैंने लुटाया
फिर क्यों तूने गरल पिलाया?
प्रिये!तुम्हीं बताओ
कैसे तुम्हें बुलाऊँ?
नहीं ,समझ आता है,मेरी-
कैसे तुम्हें मनाऊँ?
2/7/2019
प्रिये!तुम ही बतलाओ
कैसे तुम्हें मनाऊँ?
गहन-निशा जब भर लेती है
आलिंगन में जग को,
विरह तभी जलाता प्रिये!
मेरे तन-मन को।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे पास तुम्हें बुलाऊँ?
तृप्त करने को तपती वसुधा
होड़ मची मेघों में ।
बनकर हरजाई तुमने-
जुदाई - रेखा खींची क्यों?
प्रिये!तुम्ही बतलाओ
दिल का किसको हाल दिखाऊँ?
कली-कली जब शलभ मँडराते
मुझपे ढहाते जुल्म-कहर
तब काँटों की सेज पर बीते
रोजाना मेरा हर पहर।
प्रिये!तुम्हीं बतलाओ
कैसे तुम्हें रिझाऊँ?
सर्वस्व तुम पर मैंने लुटाया
फिर क्यों तूने गरल पिलाया?
प्रिये!तुम्हीं बताओ
कैसे तुम्हें बुलाऊँ?
नहीं ,समझ आता है,मेरी-
कैसे तुम्हें मनाऊँ?
2/7/2019
आत्मसंतोष
रंजन आज बहुत खुश है,क्योंकि उसका दाखिला देश के नामी कॉलेज में हो गया है।
पढ़ने में तो वह होशियार है ही, ऊपर से बड़े कॉलेज का नाम, लाखों की नौकरी लग जाएगी। सपने, गगन नापने लगे,बस चिंता है तो बस पापा की। तबियत ठीक नहीं रहती उनकी।
इन सब ख्यालों में ही खोये हुए रंजन को नींद ने अपने आगोश में ले लिया।सपने में वो देखता है,कि उसने कॉलेज में टॉप किया है, मल्टीनेशनल कम्पनी में लाखों की नौकरी लग गयी है। वह उन्मुक्त-पंछी की तरह आकाश में विचरण कर रहा है।अचानक उसका फोन घनघना उठा "हैलो! हैलो!भय्या!पापा को अटैक पड़ गया।"
पसीने से तर-ब-तर रंजन उठ बैठता है,इधर-उधर ताकता है।
हाय!इतना भयंकर सपना यदि सच हो गया तो?
मन ही मन एक फैसला लेकर वह उठा और पापा से जाकर बोला, "पापा मुझे नोकरी नहीं करनी, आपका व्यापार संभालना है।"
हाँ बेटा! किंतु पढ़ाई पूरी करने के बाद,यह कहके पिता ने बेटे को गले लगा लिया।
और रंजन आत्मसंतोष से भर गया।
1/7/2019
रंजन आज बहुत खुश है,क्योंकि उसका दाखिला देश के नामी कॉलेज में हो गया है।
पढ़ने में तो वह होशियार है ही, ऊपर से बड़े कॉलेज का नाम, लाखों की नौकरी लग जाएगी। सपने, गगन नापने लगे,बस चिंता है तो बस पापा की। तबियत ठीक नहीं रहती उनकी।
इन सब ख्यालों में ही खोये हुए रंजन को नींद ने अपने आगोश में ले लिया।सपने में वो देखता है,कि उसने कॉलेज में टॉप किया है, मल्टीनेशनल कम्पनी में लाखों की नौकरी लग गयी है। वह उन्मुक्त-पंछी की तरह आकाश में विचरण कर रहा है।अचानक उसका फोन घनघना उठा "हैलो! हैलो!भय्या!पापा को अटैक पड़ गया।"
पसीने से तर-ब-तर रंजन उठ बैठता है,इधर-उधर ताकता है।
हाय!इतना भयंकर सपना यदि सच हो गया तो?
मन ही मन एक फैसला लेकर वह उठा और पापा से जाकर बोला, "पापा मुझे नोकरी नहीं करनी, आपका व्यापार संभालना है।"
हाँ बेटा! किंतु पढ़ाई पूरी करने के बाद,यह कहके पिता ने बेटे को गले लगा लिया।
और रंजन आत्मसंतोष से भर गया।
1/7/2019
Friday, 28 June 2019
रतजगा
करते रतजगा ये नैन
दिलको कब मिलता है चैन?
अब प्रिये!आ भी जाओ
करने को मुझसे दो बैन।
दी यादों की बाती मूर
तेल विरह का पूर
दीप जलाता आठों याम
मुझे जलाता ज्यों काफूर
गए मनमीत जब से दूर।
सह-सह विरह, क्षण-क्षण मैं मरती।
पतझड़ के पत्तों सी झरती।
मन की मन में ही दफनाऊँ
बदनामी से हूँ मैं डरती।
सावनी सरिता सा मन उफनाता
कभी सागर से मिल न पाता।
प्रियतम-प्रणय की आशा में
हर पल साँसें गिन न पाता।
पर कुछ कहने मैं डरती।
रातों को मैं मीन तड़पती।
15/6/19
करते रतजगा ये नैन
दिलको कब मिलता है चैन?
अब प्रिये!आ भी जाओ
करने को मुझसे दो बैन।
दी यादों की बाती मूर
तेल विरह का पूर
दीप जलाता आठों याम
मुझे जलाता ज्यों काफूर
गए मनमीत जब से दूर।
सह-सह विरह, क्षण-क्षण मैं मरती।
पतझड़ के पत्तों सी झरती।
मन की मन में ही दफनाऊँ
बदनामी से हूँ मैं डरती।
सावनी सरिता सा मन उफनाता
कभी सागर से मिल न पाता।
प्रियतम-प्रणय की आशा में
हर पल साँसें गिन न पाता।
पर कुछ कहने मैं डरती।
रातों को मैं मीन तड़पती।
15/6/19
Tuesday, 18 June 2019
Sunday, 16 June 2019
Wednesday, 1 May 2019
हमको छल जाते !
फासले भी बड़े अजीब होते है?
बढ़ते तो बढ़ते ही चले जाते है
जाते-जाते हमको छल जाते है।
कभी घटाने की कोशिश की इनको तो,
घटाने के फेर में हम ही फिसल जाते है।
फिर लौटकर नहीं आ पाते,
जाने-अनजाने इतनी दूर निकल जाते है।
हमराही नहीं ढलते? जब हमारे अनुरूप,
हम उनके अनुरूप ढल जाते है।
यूंही साथ-साथ चलते-चलते,
कितने स्वप्न आँखों में पल जाते है।
और कभी कहीं बदनसीबी से,
पाला पड़ गया बेवफाई से
कड़ाई में पूड़ी ज्यों तल जाते है।
फिर भी जाने क्यों? किसी और की,
बाहों में वो हमें खल जाते है।
अकेलेपन का दंश झेलते-झेलते
हम यूंही एक दिन जग से चल देते है।
शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.
बढ़ते तो बढ़ते ही चले जाते है
जाते-जाते हमको छल जाते है।
कभी घटाने की कोशिश की इनको तो,
घटाने के फेर में हम ही फिसल जाते है।
फिर लौटकर नहीं आ पाते,
जाने-अनजाने इतनी दूर निकल जाते है।
हमराही नहीं ढलते? जब हमारे अनुरूप,
हम उनके अनुरूप ढल जाते है।
यूंही साथ-साथ चलते-चलते,
कितने स्वप्न आँखों में पल जाते है।
और कभी कहीं बदनसीबी से,
पाला पड़ गया बेवफाई से
कड़ाई में पूड़ी ज्यों तल जाते है।
फिर भी जाने क्यों? किसी और की,
बाहों में वो हमें खल जाते है।
अकेलेपन का दंश झेलते-झेलते
हम यूंही एक दिन जग से चल देते है।
शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.
Subscribe to:
Comments (Atom)