विजया घनाक्षरी
मर्यादाओं को झटक
मन गया है भटक
रिश्ते भी गये चटक
बंजर हुआ चमन।
जीवन नहीं सरल
स्वार्थ की घुली गरल
सुख तो हुए विरल।
गम करते शमन।
संस्कार हुए दफन
करते कैसे सहन?
न माने कोई कहन
कुछ तो करो मनन।
पकड़े रहो धरम
रखना थोड़ी शरम
जाए सुधर करम
करें पाप का दमन।
20/ 5 /2019
मर्यादाओं को झटक
मन गया है भटक
रिश्ते भी गये चटक
बंजर हुआ चमन।
जीवन नहीं सरल
स्वार्थ की घुली गरल
सुख तो हुए विरल।
गम करते शमन।
संस्कार हुए दफन
करते कैसे सहन?
न माने कोई कहन
कुछ तो करो मनन।
पकड़े रहो धरम
रखना थोड़ी शरम
जाए सुधर करम
करें पाप का दमन।
20/ 5 /2019
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