Sunday, 16 June 2019

विजया घनाक्षरी

मर्यादाओं को झटक
 मन  गया है भटक
  रिश्ते भी गये चटक
    बंजर हुआ चमन।

जीवन  नहीं  सरल
 स्वार्थ की घुली गरल
  सुख तो हुए विरल।
    गम  करते   शमन।

संस्कार हुए दफन
  करते कैसे  सहन?
   न माने कोई कहन
    कुछ तो करो मनन।

पकड़े रहो धरम
  रखना थोड़ी शरम
    जाए सुधर करम
      करें पाप का दमन।

20/ 5 /2019


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