Friday, 28 June 2019

रतजगा

करते रतजगा ये नैन
दिलको कब मिलता है चैन?
अब प्रिये!आ भी जाओ
करने को मुझसे दो बैन।

दी यादों की बाती मूर
तेल विरह का पूर
दीप जलाता आठों याम
मुझे जलाता ज्यों काफूर
गए मनमीत जब से दूर।

सह-सह विरह, क्षण-क्षण मैं मरती।
पतझड़ के पत्तों सी झरती।
मन की मन में ही दफनाऊँ
बदनामी से  हूँ मैं डरती।


सावनी सरिता सा मन उफनाता
कभी सागर से मिल न पाता।
प्रियतम-प्रणय की आशा में
हर पल साँसें गिन न पाता।
पर कुछ कहने मैं डरती।
रातों को मैं मीन तड़पती।

15/6/19

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