Tuesday, 2 July 2019

आत्मसंतोष

रंजन आज बहुत खुश है,क्योंकि उसका दाखिला देश के नामी कॉलेज में हो गया है।
पढ़ने में तो वह होशियार है ही, ऊपर से बड़े कॉलेज का नाम, लाखों की नौकरी लग जाएगी। सपने, गगन नापने लगे,बस चिंता है तो बस पापा की। तबियत ठीक नहीं रहती उनकी।
इन सब ख्यालों में ही खोये हुए  रंजन को नींद ने अपने आगोश में ले लिया।सपने में वो देखता है,कि उसने कॉलेज में टॉप किया है, मल्टीनेशनल कम्पनी में लाखों की नौकरी लग गयी है। वह उन्मुक्त-पंछी की तरह आकाश में विचरण कर रहा है।अचानक उसका फोन घनघना उठा "हैलो! हैलो!भय्या!पापा को अटैक पड़ गया।"
पसीने से तर-ब-तर रंजन  उठ बैठता है,इधर-उधर ताकता है।
हाय!इतना भयंकर सपना यदि सच हो गया तो?
मन ही मन एक फैसला लेकर वह उठा और पापा से जाकर बोला, "पापा मुझे नोकरी नहीं करनी, आपका व्यापार संभालना है।"
हाँ बेटा! किंतु पढ़ाई पूरी करने के बाद,यह कहके पिता ने बेटे को गले लगा लिया।
और रंजन आत्मसंतोष से भर गया।

1/7/2019

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