Wednesday, 1 May 2019

हमको छल जाते !

फासले भी बड़े अजीब होते है?
बढ़ते तो बढ़ते ही चले जाते है
जाते-जाते हमको छल जाते है।

कभी घटाने की कोशिश की इनको तो,
घटाने के फेर में हम ही फिसल जाते है।

फिर लौटकर नहीं आ पाते,
जाने-अनजाने इतनी दूर निकल जाते है।

हमराही नहीं ढलते? जब हमारे अनुरूप,
हम उनके अनुरूप ढल जाते है।

यूंही साथ-साथ चलते-चलते,
कितने स्वप्न आँखों में पल जाते है।

और कभी कहीं बदनसीबी से,
पाला पड़ गया बेवफाई से
कड़ाई में पूड़ी ज्यों तल जाते है।

फिर भी जाने क्यों? किसी और की,
बाहों में वो हमें खल जाते है।

अकेलेपन का दंश झेलते-झेलते
हम यूंही एक दिन जग से चल देते है।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

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