Wednesday, 1 May 2019

नकेल !

मन भी बड़ा अजीब होता है?
जो मिलता है उसे छोड़,
कभी-कभी बिन बताए
जो नहीं मिलता,
उसके पीछे सरपट भागता है।

पवन वेग सा दौड़ता
नहीं एक जगह टिकता?
लाख करे जतन,
रात-रात भर जागता है।

साँझ देखे न सवेरा?
वक्त-बेवक्त,
इच्छाओं के गोले दागता है।

बेलगाम घोड़े सा स्वछंद घूमता
नकेल न डालो तो,
चाहे जब लात मारता है।

भोग की ऐसी पड़ी लत
एक पूरी हो की,
दूसरी कामना पालता है।

जिसने समझ ली इसकी फितरत को
वही मनुज इसके,
भक्ति की नकेल डालता है।

शकुन
सर्वाधिकार सुरक्षित


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