Wednesday, 1 May 2019

क्यों?तुम्हारा पौरुष !

पुरुष!
कब तलक भरते रहोगे?
अपने पुरुषत्व का थोथा दंभ
क्यों? तुम्हारा पौरुष
नहीं कर सकता नारी का सम्मान
हक किसने दिया तुम्हें?
जो छलते हो उसके अरमान।


कैसी विडम्बना है प्रभो!
जो बना तेरी अनुपम कृति का,
करने को पोषण!
वही बन बैठा मालिक
और करने लगा शोषण।

चलाकर खूब आरियाँ
उसके सपनों पर
उसका दामन अश्रु से भरता है
विधि के विधान से
तनिक भी नहीं डरता है
अपने अहमपुर्ति हेतु
जीवन भर उसे छलता है।

कभी हवस में होकर बावला
नारी के तन-मन को खूंदता है
फिर उसकी सिसकियों से
बेपरवाह होकर आँखें मूंदता है

खोखलेपन में कब तक जिओगे?
कब तक खेर मनाओगे?
त्याग झूठा मद,
हृदय! प्रेम को उगा
नहीं तो रह जाएगा ठगा।

शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
भीलवाड़ा राज.

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