Friday, 28 June 2019

रतजगा

करते रतजगा ये नैन
दिलको कब मिलता है चैन?
अब प्रिये!आ भी जाओ
करने को मुझसे दो बैन।

दी यादों की बाती मूर
तेल विरह का पूर
दीप जलाता आठों याम
मुझे जलाता ज्यों काफूर
गए मनमीत जब से दूर।

सह-सह विरह, क्षण-क्षण मैं मरती।
पतझड़ के पत्तों सी झरती।
मन की मन में ही दफनाऊँ
बदनामी से  हूँ मैं डरती।


सावनी सरिता सा मन उफनाता
कभी सागर से मिल न पाता।
प्रियतम-प्रणय की आशा में
हर पल साँसें गिन न पाता।
पर कुछ कहने मैं डरती।
रातों को मैं मीन तड़पती।

15/6/19

Tuesday, 18 June 2019

मनहरण घनाक्षरी

पावनमय प्रीत से
  मधुरिम संगीत से
    सुगंध भरे गीत से
       गेह महकाइये।

  बहती  रसधार  हो
   सबके प्रति प्यार हो
    सुखमय संसार हो
       खुशियाँ लुटाइये।

मर्यादा को धार कर
  खुदगर्जी  पार कर
   अहम् पुचकार कर
     कर्तव्य निभाइये।

मन  में  ईमान  रख
 बुजुर्गों का मान रख
   स्वयं का सम्मान रख
       जीवन सजाइये।

12/5/2019

Sunday, 16 June 2019

विजया घनाक्षरी

मर्यादाओं को झटक
 मन  गया है भटक
  रिश्ते भी गये चटक
    बंजर हुआ चमन।

जीवन  नहीं  सरल
 स्वार्थ की घुली गरल
  सुख तो हुए विरल।
    गम  करते   शमन।

संस्कार हुए दफन
  करते कैसे  सहन?
   न माने कोई कहन
    कुछ तो करो मनन।

पकड़े रहो धरम
  रखना थोड़ी शरम
    जाए सुधर करम
      करें पाप का दमन।

20/ 5 /2019